छत्तीसगढ़ के लोक जीवन में हाना का महत्व

 

डॉ. यशवंत कुमार साव

मदनलाल साहू शासकीय महाविद्यालय अरमरीकला, जिला-बलोद (छ.ग.) 

*Corresponding Author E-mail: yashwantsao@gmail.com

 

ABSTRACT:

छत्तीसगढ़ के लोक जीवन में हाना का विशेष स्थान है | ‘हाना’ जिसे लोकोक्ति भी कहा जाता है यह लोक के दीर्घकालिक चिंतन, अनुभव और ज्ञान का परिणाम है | हाना विशेष परिस्थिति में उपजे वाक्य होते हैं जो अत्यंत प्रभावी होते हैं | सहज सरल होने के साथ ही गंभीर से गंभीर बात को कम शब्दों में व्यक्त करने की इसमें क्षमता होती है | हाना लोक का मार्गदर्शन करती है इसमें लोक व्यवहार, धर्म, दर्शन, शिक्षा सभी का समावेश होता है | छत्तीसगढ़ के लोक जीवन में जिसे अक्षर ज्ञान भी नहीं है वे सभी अपनी बात को और अधिक प्रभावी, तर्कसंगत और प्रामाणिक बनाने के लिए हाना का प्रयोग करते हैं |

 

KEYWORDS: छत्तीसगढ़, लोकजीवन, लोकोक्ति, हाना, लोक साहित्य |

 

 


INTRODUCTION:

‘धान का कटोरा’ कहलाने वाला छत्तीसगढ़ प्राकृतिक संसाधनों से सम्पन्न एवं समृद्ध राज्य है| छत्तीसगढ़ अपने खनिज संसाधनों, कृषि एवं वन उपजों, हरे-भरे सघन वनों, प्राकृतिक सौन्दर्य  के साथ ही अपनी समृद्ध एवं गरिमामयी लोक संस्कृति के लिए विश्व विख्यात है| सरगुजा से बस्तर तक यहाँ लोक संस्कृति के विभिन्न रूपों के दर्शन होते है | यहाँ की लोक संस्कृति में लोक नृत्य, लोक गीत, लोक पर्व, लोक कला, लोक परंपरा, लोक मान्यताओं का अमूल्य भंडार है | लिखित भाषा का प्रयोग न करने वाले लोक समुदाय में संस्कृति का ढांचा वाचिक परंपरा पर मजबूती से खड़ा रहता है| लोक में अक्षर ज्ञान के पूर्व से ही लोक कथा, लोक गाथा, लोक नाट्य, लोक सुभाषित की वाचिक परम्पराएं निरंतर प्रवाहमान है | लोक संस्कृति की वाचिक परंपरा को आज हम लोक साहित्य के नाम से जानते हैं जिसके अंतर्गत लोक गाथा, लोक गीत, लोक कथा, लोक नाट्य और लोकोक्तियों का समावेश किया जाता है | लोक साहित्य में लोकोक्तियों का विशेष महत्व है इसके माध्यम से किसी जटिल बात को भी सहज सरल अंदाज में आसानी से कहा जा सकता है| “लोकोक्तियाँ अनुभव सिद्ध ज्ञान की निधि है| मानव ने युग-युग से जिन तथ्यों का साक्षात्कार किया है उनका प्रकाशन इनके माध्यम से होता है| ये चिरकालीन अनुभूत ज्ञान के सूत्र हैं|”1 लोकोक्ति का प्रयोग प्राचीन काल से ही किया जा रहा है संस्कृत के विभिन्न ग्रंथों में लोकोक्ति का प्रयोग किया गया है| कृष्ण देव उपाध्याय के अनुसार “लोकोक्ति की परंपरा अत्यंत प्राचीन है| अनुसंधान करने से पता चलता है कि वेदों में भी इसकी सत्ता उपलब्ध है| उपनिषदों में भी लकोक्ति की कमी नहीं है| संस्कृत साहित्य में तो ये प्रचुर परिमाण में पायी जाती है|”2  लोकोक्तियाँ लोक का मार्गदर्शन करने के साथ धर्म और नैतिकता के मार्ग पर चलने की प्रेरणा भी देती है| भोलानाथ तिवारी के अनुसार अनुभव का सागर जब कुछ शब्दों की गागर में समा जाता है तो लोकोक्ति बन जाता है लोकोक्तियां जनमानस की हार होती है तथा वे हर वक्त हर समय जन जन के साथ गुरु शुभचिंतक मित्र तथा वैद्य आदि बनकर उनका मार्गदर्शन करती है जब भी कोई समस्या आई कोई ना कोई लोकोक्ति उसका समाधान करने के लिए तैयार मिलेगी शर्त यह है कि लोकोक्तियां आपको याद हो |लोकोक्ति में लोक जीवन का अनुभव समाहित होता है | भोलानाथ तिवारी के अनुसार “जीवन के ज्ञान का असली सोना जन-जन के अनुभव की आंच में तपकर जब कुंदन बन जाता है तो उसे लोकोक्ति कहते हैं|”4

 

छत्तीसगढ़ में लोकोक्ति के लिए ‘हाना’ शब्द प्रचलित है| छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति को समृद्ध बनाने में लोकोक्तियों अर्थात हाना का महत्वपूर्ण योगदान है | छत्तीसगढ़ के लोक जीवन को हाना के माध्यम से सहजता से समझा जा सकता है | हाना का प्रयोग लोक मानस अपनी बात को अधिक प्रभावी बनाने के लिए, समझाने या सचेत करने के लिए करता है| ‘हाना’ गागर में सागर के समान है इसका स्वरूप छोटा होने के बाद भी इसमें  जीवन सागर का संचित ज्ञान समाहित रहता है | हाना लोक का ज्ञान कोश है, लोक में  जब कोई अपनी बात को संक्षेप में समझाना चाहता है तो उसके मुख से अनायास ही हाना निकल जाता है| इसके लिए किसी विशेष अवसर या समय की प्रतीक्षा नहीं होती बातों बातों के प्रसंग मे ही पुष्टि या प्रमाण स्वरूप हाना मुख से प्रकट हो जाता है | छत्तीसगढ़ के लोक जीवन में  हाना का समृद्ध एवं विशाल भंडार विद्यमान है जिसमें कृषि संबंधित जानकारी धर्म, जीवन दर्शन, शिक्षा, लोक व्यवहार, नैतिक ज्ञान आदि से संबंधित हाना का पारंपरिक रूप मिलता है |

 

कृषि संबंधित हाना :

‘बरसा पानी बहे न पावे तब खेती के मजा देखावे’ इसका अर्थ है यदि हम वर्षा के जल के सहेज कर रखते है तो खेती अच्छी होगी | इस हाना के माध्यम से वर्षा के जल को संचित करने और उसका उपयोग खेती में करने की प्रेरणा मिलती है | आज जिसे हम ‘रेन वाटर हार्वेस्टिंग’ कहते है छत्तीसगढ़ के लोक जीवन में पहले से ही उससे संबंधित हाना का प्रचलन है | ‘खेती अपन सेती’ खेती किसी दूसरे के भरोसे नहीं हो सकती है किसान को कृषि कार्य स्वयं करना पड़ता है तभी उसे सही उपज प्राप्त कर  सकता है | ‘डार के चूके बेंदरा अऊ आसाढ़ के चूके किसान’, जिस प्रकार वानर का डाल को नहीं पकड़ पाने पर गिरना निश्चित है उसी प्रकार किसान को भी आषाढ़ के महीने मे सजग रहना पड़ता है यदि किसान इस महीने में चूक जाता है तो उसे कृषि में नुकसान उठाना पड़ता है| ‘बो दे गहूँ चल दे कहूँ’, इसका अर्थ है कि गेहूँ की बुवाई करके किसान आराम से कहीं जा सकता है क्योंकि गेहूँ की फसल को ज्यादा देखभाल की आवश्यकता नहीं होती| ‘खेत बिगाड़े सोमना गाँव बिगाड़े बंभना’ इस हाना मे ‘सोमना’ एक खरपतवार है जो पूरे खेत को खराब कर देता है वैसे ही ब्राम्हण पूरे गाँव को बिगाड़ सकता है |

 

धर्म जीवन दर्शन संबंधित हाना:

‘अपन मरे बिना सरग नई दिखे’ स्वर्ग देखने के लिए हमें मरना पड़ेगा | मनुष्य को अपने ही कर्मों का फल प्राप्त होता है यदि हम अच्छे फल की कामना रखते हैं तो हमें कर्म भी अच्छा करना पड़ेगा | ‘जइसन बोही तइसन लूही’ जो जैसा कर्म करेगा उसको वैसा ही फल प्राप्त होगा | तुलसीदास ने भी इसी प्रकार से कहा है – “कर्म प्रधान विश्व रचि  राखा, जो जस करहिं सो तस फल चाखा” | ‘पानी पीवो छान के गुरु बनावो जान के’ जिस प्रकार हम पानी को शुद्ध करके पीते हैं उसी प्रकार जीवन में गुरु भी सोच समझकर बनाना चाहिये | ‘भगवान के घर देर हे अंधेर नइये’ भगवान सभी व्यक्ति को उनके कर्मों के अनुरूप फल अवश्य देते है भले ही इसमें कुछ विलंब हो जाए लेकिन मिलता अवश्य है | ‘मानो त देवता नहीं ते पथरा’ मनुष्य की भावना ही सभी कुछ निर्धारित करती हैं हमारी भावना ही है जो हमें पत्थर में देवता के दर्शन होते है | ‘पाप ह छानही में चढ़के नाचथे’ पाप कर्म कभी नहीं छिपा सकते हैं एक न एक दिन प्रकट हो ही जाता है|

 

शिक्षा संबंधित हाना :

‘आप रूप भोजन पर रूप सिंगार’ हमें भोजन अपनी रूचि के अनुसार एवं शृंगार दूसरे लोगों को अच्छा लगे ऐसा करना चाहिए | ‘भागे मछरी जांग बरोबर’ जो वस्तु हमें प्राप्त नहीं होती है वह अधिक मूल्यवान लगती है | ‘चननी म दूद दूहय अऊ करम ल दोस दे’ मनुष्य स्वयं गलती करता है और उसका दोष भाग्य  पर डालता है | मनुष्य जब कोई कार्य ठीक से नहीं करता है तब वह इसका दोष भाग्य को देता है | ‘बैरी बर ऊंच पीड़हा’ छत्तीसगढ़ के लोक जीवन में ऐसा कहा जाता है कि दुश्मन को घर आने पर और अधिक सम्मान देना चाहिए |

 

लोक व्यवहार संबंधित हाना :

‘मंगल छुरा बिरस्पत तेल बंस बुड़े जे काटे बेल’ इस हाना मे लोक जीवन की मान्यता के दर्शन होते है कि किस प्रकार वे मंगलवार के दिन नाई के पास नहीं जाते गुरुवार को तेल से दूरी और बेल के वृक्ष को कभी नहीं काटते | ‘जिहां गुड़ तिहाँ चाटी’ स्वार्थी मनुष्य वहाँ पहुँच जाता है जहां उसका स्वार्थ सिद्ध हो रहा हो | ‘बिना रोए दाई दूध नई पियाए’ जिस प्रकार बच्चे के रोने पर उसकी माँ दूध पिलाती है उसी प्रकार मानव को भी जीवन मे मांगने पर ही कुछ मिलता है | ‘जे खेलय तास तेकर होवय नास’ जो जुआ खेलता है उसका नाश होता है |

 

छत्तीसगढ़ी में बहुत बड़ी संख्या में हाना सुनने को मिलते है जिसमें से यहाँ कुछ उदाहरण दिये गये है इनके अतिरिक्त हिन्दी के कहावतों से मिलता हुआ भी हाना है जैसे- ‘हाथी के पेट सुहारी म नई भरय’ इसका अर्थ है हाथी जैसे विशालकाय प्राणी का पेट पूड़ी से नहीं भर सकता है इसके लिए हिन्दी में कहावत है ‘ऊंट के मुंह मे जीरा’ | इसी प्रकार ‘एक म्यान मे दो तलवार नहीं रह सकते’ इसके लिए छत्तीसगढ़ी में हाना ‘एक जंगल में दू ठन बाघ नई रहाय’ का प्रयोग करते है छत्तीसगढ़ी हाना मे म्यान के लिए जंगल और तलवार के लिए बाघ का प्रयोग द्रष्टव्य है | ‘दुब्बर बर दू आसाढ़’ हाना की तुलना हम हिन्दी के ‘गरीबी में आटा गीला’ से कर सकते हैं |

 

 

उपसंहार :

छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति में लोकोक्ति अर्थात हाना का अत्यंत महत्व है| हाना चिर संचित ज्ञान एवं अनुभव का प्रतीक है | लोक जीवन में वर्षों के अनुभव के आधार पर हाना का सृजन होता जिसकी  लोक जीवन मे स्वीकार्यता अनिवार्य है| छत्तीसगढ़ के लोक के वाणी की कुशलता हाना के माध्यम से परिलक्षित होती है | यहाँ का कृषक, मजदूर जिसे अक्षर ज्ञान भी नहीं है जब किसी विपत्ति का हल चाहता है, किसी दुख को दूर करना, किसी को शिक्षा देना, अपनी बात को अत्यधिक प्रामाणिक बनाना, किसी बात पर व्यंग्य करना कोई सामाजिक संदेश देना, किसी बात से सचेत करना चाहता है तब वह इसी हाना का आश्रय लेता है और वह अपने उद्देश्य मे सफल होता है| उसकी बात हाना के माध्यम से सीधे हृदय को भेदती है और उसका गहरा प्रभाव पड़ता है| छत्तीसगढ़ी हाना की तुलना हम बिहारी सतसई के दोहे से कर सकते हैं –

“सतसइया के दोहरे ज्यों नावक के तीर

देखन मे छोटे लगै घाव करै गंभीर |”5

 

संदर्भ सूची-

1.     उपाध्याय डॉ. कृष्णदेव : लोक साहित्य की भूमिका साहित्य भवन, इलाहाबाद -1957 ; पृ.-137

2.     वही  पृ.-138

3.     तिवारी डॉ. भोलानाथ : वृहत हिंदी लोकोक्ति कोश; किताबघर प्रकाशन, नयी दिल्ली-2007; भूमिका

4.     वही  भूमिका

5.     भार्गव दुलारेलाल : बिहारी रत्नाकर :गंगा पुस्तकमाला, लखनऊ-1983; मुख पृष्ठ

 

 

 

 

 

Received on 28.01.2023         Modified on 23.05.2023

Accepted on 04.08.2023         © A&V Publication all right reserved

Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2023; 11(3):171-174.

DOI: 10.52711/2454-2687.2023.00028